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कौन थे विधायक जवाहर पंडित, कैसे जौनपुर के एक गांव से निकलकर इलाहाबाद पर कर रहे थे राज और कैसे हुई थी हत्या, पढिये सबकुछ

इलाहाबाद / प्रयागराज : इलाहाबाद यानी प्रयागराज की सियासी लहरें हमेशा पूरे देश के लिये चर्चा का विषय बनी रही। यहां की सियायत पहले जवाहर लाल नेहरू जैसे राजनीतिज्ञों की वजह से दुनिया में जानी गयी, लेकिन कालांतर में यहां की राजनीति में बाहुबल और धनबल का ऐसा नशा चढ़ा कि हर चुना गया सांसद विधायक दर्जनों मुकदमें में फंसा रहा। फिर चाहे वह अतीक अहमद रहे हो, राजू पाल, अशरफ, जवाहर यादव उर्फ पंडित या करवरिया परिवार के कपिल मुनि, सूरज भान आदि। 4 नवंबर को इलाहाबाद के सबसे बड़े राजनैतिक रसूख वाले घराने यानी करवरिया परिवार की राजनीति में बेडियां डालने वाले केस में फैसला आया और जवाहर यादव यानी जवाहर पंडित की हत्या के केस में करवरिया बंधुओं को उम्र कैद की सजा सुनाई गयी। लेकिन, जवाहर पंडित कौन थे और यह मामला इतना हाईप्रोफाइल क्यों हुआ। आपको हम इस खबर में पूरी डिटेल से बतायेंगे।

कौन है करवरिया पहले जानिये
जवाहर पंडित की हत्या में उम्र कैद की सजा पाने वाले पूर्व सांसद कपलि मुनि करवरिया, पूर्व विधायक उदय भान व पूर्व एमएलसी सूरज भान व उनके रिश्तेदार कल्लू त्रिपाठी इलाहाबाद ही नहीं आस के लगभग 5 जिले की राजनीति को सीधे तौर पर प्रभावित करते थे। इलाहाबाद, प्रतापगढ़, कौशांबी, भदोही और जौनपुर के अलावा मछली शहर व मिर्जापुर का बहुत बड़ा हिस्सा करवरिया बंधुओं के इशारे में उठता बैठता रहा है। कपिल मुनि जहां बसपा के बडे लीडर और सांसद रहे, वहीं उदय भार भाजपा के बाहुबली नेताओं की छवि में गिने जाते रहे, जिनका कद सीधे सीएम तक पहुंच बनाता था। ज जब सपा बसपा का प्रभुत्व इलाहाबाद पर पूरी तरह से अपने शिकंजा बनाये हुये था, तब उदय भान लगातार विधायक चुने जाते रहे। बकि एमएलसी सूरज भान की पहुंच झांसी तक के इलाके में बनी हुई थी। इससे भी बड़ी बात यह थी कि जब तक करवरिया परिवार सक्रिय राजनीति में रहा और जेल में नहीं थे, यहां की राजनीति में इस परिवार के आगे किसी की नहीं चलती दिखी। यहां तक की मौजूदा दिग्गज नेता व उपमुख्यमंत्री केशव मौर्य, मंत्री नंदी व मंत्री सिद्धार्थ की भी। जबकि इलाहाबाद उत्तरी समेत इलाहाबाद की 8 विधानसभा पर करवरिया परिवार सीधी पकड़ रखता था और प्रत्याशियों की हार जीत में इनका आशीर्वाद बेहद ही माइने रखता था। अगर इस केस से करवरिया बंधु बरी हुये होत तो निश्चित तौर पर एक बार फिर से

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कौन थे जवाहर पंडित
जवाहर लाल यादव मूल रूप से जौरपुर के एक छोटे से गांव खैरतारा के रहने वाले थे। पूजा पाठ व धार्मिक क्रिया कलापों में अत्याधिक आस्थावान होने के कारण उनके करीबी उन्हें पंडित कहरकर बुलाते थे और फिर यही पंडित शब्द उनक टाइटल से जुड़ गया और वह जवाहर यादव से ज्यादा जवाहर पंडित के नाम से जाने जाने लगे। जौनपुर में अपने गांव से लेकर इलाके में जवाहर का नाम उन दबंग लोगों में गिना जाता था, जिनकी इलाके में खूब चला करती थी। कद काठी से हष्टपुष्ट जवाहर की टोली भी उसी हिसाब की थी। जवाहर ने बचपन से ही बड़ा आदमी बनने की ख्वाहिशे पाल रखी थी, लेकिन छोटा शहर जवाहर के सपनों को उडान नहीं दे पा रहा था। इसी बीच जवाहर को इलाहाबाद में शराब व बालू के धंधे के साथ ठेकेदारी के लिये कुछ लोगों ने आफर किया और बताया कि वहां बेहद तेजी से पैर फैलाया जा सकता है। 1981 में जवाहर ने घर छोड़ने का फैसला लिया और वह झूंसी आ गए। शुरूआती दिनों में जवाहर ने अपने आस पास पड़ोस से लेकर इलाके को पहले समझना शुरू किया और मेल जोल के साथ बिरादरी में पकड़ बनानी शुरू की। इलाहाबाद के तत्कालीन दारू के ठेकेदारों से परिचय व दोस्ती होने के बाद जवाहर ने भी इसी धंधे में सबसे पहले हाथ डाला । अपनी दबंग छवि व पकड़ के चलते जवाहर के शराब का धंध चल निकला, पुलिस से लेकर नेताओं और अडंगा लगाने वालों से जवाहर ने घुलमिलकर अपना साम्राज्य स्थापित करना शुरू किया तो देखते ही देखते शराब के धंधे में जवाहर का नाम चलने लगा। लेकिन, जवाहर के सपनों की उडान ने उसे अगला कदम बालू के धंधे की ओर बढाने को कहा।

बालू से बढी दुश्मनी
जवाहर ने जिस बालू के धंधे में अपना पैर डाला था, उस धंधे पर करवरिया परिवार का बर्चस्व था। बालू पर या तो करवरिया परिवार राज कर रहा था या उनके लोग और यह बात आस पास के तीन जिलों में लोग बखूबी जानते थे और कोई भी करवरिया परिवार से रंजिश रखने की बजाय अपना रास्ता ही बदलता रहा। लेकिन, जवाहर ने बालू के धंधे में अपनी धमक बनानी शुरू की और यही से करवरिया परिवार के साथ उनकी अनबन शुरू हो गयी। यह अनबन बढती रही, लेकिन जवाहर ने कदम पीछे नहीं खीचे और अब वह राजनीति में भी आने की कोशिश करने लगा।

मुलायम सिंह का सिर पर हाथ
जवाहर के लिये वर्ष 1989 बेहद ही अहम रहा। यह वर्ष जवाहर यादव के लिये यह संजीवनी समझी जा सकती थी या संरक्षण । 1989 के आम चुनावों से पहले जवाहर पंडित ने किसी के माध्यम से मुलायम सिंह यादव से मुलाकात कर ली और फिर मुलायम का सिर पर हाथ पाकर जवाहर बेफिक्र होकर अपना साम्राज्य स्थापित करने लगा। मुलायम से मिलने के बाद जवाहर ने उस चुनाव में हर तरह से खुद को समर्पित किया और फंड देने से लेकर प्रचार प्रसार व नेताओं के आने जाने पर इंतजाम आदि की सारी जिम्मेदारियां निभाई। मुलायम सिंह, जवाहर के समर्पण से बेहद ही प्रभावित हुई और अगले कुछ सालों में वह मुलायम सिंह के इलाहाबाद में सबसे खास लोगों में शुमार हो गये, जो कभी भी मुलायम से मिल सकते थे।

राजनीति से बढा रसूख
यूपी में मुलायम जब मुख्यमंत्री बने तो जवाहर पंडित का रसूख अपने चरम पर पहुंच गया और मुलायम सिंह ने जवाहर को चुनाव आदि लड़ने की मंशा पूछा तो जवाहर ने अपनी इच्छा बता दी और फिर वह राजनीति करने के लिये अपनी सियायी जमीन तैयार करने लगा। 1991 में मुलायम सिंह ने जवाहर को झूंसी विधानसभा क्षेत्र से टिकट दिया और जवाहर ने अपने पहले ही मुकाबले में जोरदार लडाई करते हुये लगभग जीत के मुंहाने तक पहुंचने का फासला तय किया। इस चुनाव में महज 642 वोटों से जवाहर हार गये, लेकिन यह तय हो गया कि आगे आने वाले समय में जवाहर विधायक बनेंगे। हालांकि इस चुनाव ने हार के बाद भी जवाहर का रसूख इतना बढाया कि अब जवाहर बालू के ठेके में हिस्सेदारी के बजाय अपना कब्जा और एकक्षत्र राज की ओर बढने लगा और बताया जाता है कि करवरिया परिवार से इसके कारण दुश्मनी गाढ़ी होने लगी।

1993 में बने विधायक
1993 में फिर से जब चुनाव हुआ तो जवाहर झूंसी से विधायक बन गये।  सपा बसपा गठबंधन हुआ, सरकार बनी तो जवाहर का कद आसमान छूने लगा। जवाहर का सियासी रसूख इलाहाबाद की राजनीति में आसमान छूने लगा। कुछ समय बाद एक बडी घटना 1996 में हुई।  उस समय विधानसभा भंग हो चुकी थी और सिविल लाइंस में जवाहर यादव पर हमला हुआ और एके 47 से ताबडतोड़ गोलियां जवाहर यादव पर बरसाई गयी। 13 अगस्त की इस घटना में तीन लोगों की मौत हो गयी, जबकि दो राहगीर घायल हो गये। हत्या की खबर सुनते ही मुलायम सिंह खुद जवाहर के घर पहुंचे और परिवार के लोगों से मुलाकात कर पूरे घटना क्रम को समझा और हर संभव मदद का आश्वासन देकर वापस लौटे। इसी मामले में करवरिया बंधुओं पर मुकदमा दर्ज हुआ और बालू के ठेके आदि की रंजिश में हत्या का आरोप लगा। जिसमे अब करवरिया बंधुओं पर आरोप साबित हुआ और उन्हें उम्र कैद की सजा सुनाई गयी है।

अब क्या है स्थिति
जवाहर यादव का परिवार अब पूरी तरह से राजनैतिक परिवार में बदल चुका है। पत्नी व बेटियां भी राजनीति में हैं। पत्नी विजमा यादव सपा के टिकट पर ही दो बार विधायक बन चुकी हैं। जबकि बेटी निधि भी छात्र राजनीति से निकलकर फूलपुर की ब्लाक प्रमुख आदि बन चुकी हैं। हालांकि बीते चुनाव में विजमा चुनाव हार गयी थी, जबकि बेटी निधि के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव के बाद वह भी पद पर नहीं हैं। हालांकि बेटी ज्योति की 21 नवंबर को शादी है। लेकिन करवरिया बंधुओ को सजा मिलने के बाद सभी ने इसे न्याय की जीत बताया और कहा कि 23 साल बाद उन्हें न्याय मिला है।

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Written by Amarish Shukla

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