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क्या है बजट की असलियत ? अतुल आक्रोश की कलम से..

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लखनऊ। चलिये बजट आ गया और चली आ रही हमारी पुरातन परम्परा के मुताबिक एक पक्ष के मुताबिक बजट सबसे अच्छा बजट है पर दूसरे पक्ष यानी विपक्ष के मुताबिक बजट में हमेशा की तरह आम जनता के लिए कुछ नहीं है..
अच्छा सोशल मीडिया पर जितने लोग कल से बजट पर दांत चिराये पोस्ट कर रहे हैं..क्या लगता है उसमें से कितने लोगों को बजट की बारीकी समझ आयी होगी..?
ऊपर की चार लाइन पढ़ ली..टी.वी. पर सरकार और विपक्ष के प्रवक्ताओं को सुन लिया पर फिर शुरू हो गए अपनी अपनी पार्टी के हिसाब से नफा-नुकसान गिनाने में..लगता है हर साल भूल जाते हो कि ऐसा ही बजट हर साल आता है औऱ हर साल ऐसे ही चिल्लाते हुए इधर उधर से दे कॉपी..दे पेस्ट..
जबकि असली मसला कभी समझ ही नहीं पाए..
चलिये 6 इंच के डिब्बे से निकलकर बाहर तो आइए तब आपको पता चलेगा कि हर साल बजट में लाखों करोड़ों की योजनाओं के बाद भी निम्न वर्ग अभी भी वहीं खड़ा है जहाँ पिछले साल खड़ा था..किसान आज भी वैसे ही परेशान है जैसे पिछले कई वर्षों से परेशान था औऱ मिडिल क्लास अभी लोन पर मकान खरीदने या गाड़ी खरीदने की आवश्यकता पर ही इनकम टैक्स रिटर्न्स भरने के लिए गुणा भाग लगाता है..
और सच बोलूं तो मुझे क्या देश के लगभग हर अराजनैतिक व्यक्ति को अब इन लोक लुभावने बजट जैसी चीजों से कोई फर्क नहीं पड़ता..हां लेकिन फर्क पड़ता तब पड़ता है “जब कोई किसान कर्ज में डूब कर अपने ही खेत की मेड़ के किनारे लगे..अपने ही हाथों से सींचे गए पेड़ पर फांसी लगा कर खुद को इस मिट्टी में समर्पित कर देता है..हमें फर्क तब भी पड़ता है जब हम अखबार के किसी कोने में छपी खबर पढ़ते हैं कि “सही समय पर इलाज न मिलने के कारण सरकारी अस्पताल में कोई मर गया..
जब जब हम किसी मासूम बच्ची की अस्मिता से खिलवाड़ की खबर सुनते हैं तो हमारा दिल आक्रोशित हो उठता है..हम परेशान हो जाते हैं जब कुपोषण के शिकार बच्चों की मौत की खबर मीडिया में आती है..हमें बजट से ज्यादा चिंता अपने शहर के बेरोजगार युवाओं की है जो बेरोजगारी के आलम में अपराध का काला दामन थमने में भी संकोच नहीं करते..और कई बार आत्महत्या तक कर लेते हैं
और ये बजट पता नहीं कैसे आपको खुश कर जाता है..हमें बजट नहीं
बल्कि चौराहे के किसी कोने पर उदास खड़े ठेले वाले बुजुर्ग के चेहरे पर मुस्कान चाहिए..हमें बजट की नहीं बल्कि गलियों में कूड़ा बिन रहे भारत के आने वाले भविष्य के हाथों में एक अदद कॉपी-पेन और पीठ पर बस्ते की ज्यादा जरूरत है..!
अतुल आक्रोश की कलम से..
सम्पादक का उपरोक्त लेख से सहमत होना अनिवार्य नहीं है.


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