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ज्ञान की अलख जगा रहा एक ‘वर्दीवाला द्रोणाचार्य’ अनूप मिश्रा

ये स्ट्रीट क्लास कोई योजनाबद्ध कोचिंग क्लास जैसी नहीं थी बल्कि अनूप के मन मे उपजी वो टीस थी उनके मन मे उस वक़्त घर कर गई जब वो ख़ुद इंटरमीडिएट की पढ़ाई के दौरान अपने जेबखर्च के लिए ट्यूशन पढ़ाया करते थे।

Anup Mishra
अनूप मिश्रा बाल चौपाल के बच्चों सहित अपनी पत्नी के साथ ( पुलिस की वर्दी पहने हुए)

खाकी वर्दी का खौफ़  हो या खाकी वर्दी का साथ दोनों ही पहलू हमें समाज में देखने को मिलता है लेकिन खाकी वर्दी के फौलादी सीने में प्यार,जज़्बात,समर्पण और मानवीय संवेदनाओं का खूबसूरत तालमेल बहुत कम देखने को मिलता है ।

ऐसे ही गुणों का तालमेल बिठाकर तमाम चेहरों की मुस्कुराहट के लिए कदमताल करते हुए लखनऊ की सरजमीं पर पुलिस विभाग के सब इंस्पेक्टर अनूप मिश्रा “अपूर्व” एक नई इबारत लिख रहे हैं।

मानवीय मूल्यों से ओत-प्रोत अनूप कुमार मिश्रा पुलिस की छवि को उदार , संवेदनशील होने के साथ राष्ट्र और समाज के प्रति सच्चे भाव से समर्पित पुलिस के रूप में बनाने की कदावर कोशिश में स्वर्णिम भविष्य के हीरों को तराशने का कार्य कर रहे हैं।मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे अनूप मिश्रा अपनी ड्यूटी का दायित्व निभाने के बाद बचे हुए समय में अभावग्रस्त बच्चों को निःशुल्क शिक्षित करने का कार्य कर रहे हैं ।

उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले में मिली पहली पोस्टिंग

पुलिस सेवा में आने जे बाद सन 1997 में उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले में पहली पोस्टिंग हुई थी । लेकिन दूसरों के लिए कुछ कर गुजरने के ख्याल ने जन्म दिया स्ट्रीट क्लास को। जी हां स्ट्रीट क्लास जो अनूप मिश्रा ड्यूटी के बाद बचे समय मे यहाँ चलाने लगे थे ।

Anup Mishra

ये स्ट्रीट क्लास कोई योजनाबद्ध कोचिंग क्लास जैसी नहीं थी बल्कि अनूप मिश्रा के मन मे उपजी वो टीस थी उनके मन मे उस वक़्त घर कर गई जब वो ख़ुद इंटरमीडिएट की पढ़ाई के दौरान अपने जेबखर्च के लिए ट्यूशन पढ़ाया करते थे। उस वक्त आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण कई अच्छे बच्चे पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते थे।

इस बात से व्यथित होकर अनूप ने अपनी स्नातक व एल.एल.बी की पढ़ाई के दौरान तमाम बच्चों को बिना फीस के ही पढ़ाया और  कूड़ा बीनने वाले, भीख मांगने वाले , झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले बच्चों को शिक्षा का महत्व समझाकर उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित किया।

ऐसे विशेष बच्चों को समाज की मुख्य धारा से जोड़ने का सतत प्रयास करते रहे । उन्नाव रेलवे स्टेशन के आस पास के जो बच्चे गरीबी के कारण नहीं पढ़ पा रहे थे और जो पढ़ तो रहे थे किंतु एक  अच्छे शिक्षक के अभाव के कारण पढ़ाई में कमजोर थे, वे सभी स्ट्रीट क्लास का हिस्सा बने।

किसी ने पहली बार चाक पकड़कर अक्षरों की ताक़त को महसूस किया तो किसी ने अक्षरों को सुनहरे रंग में बदलने का हुनर सीखना शुरू किया।  दो चार बच्चों से शुरू हुए सफ़र में हमसफ़र बढ़ते गए और शिक्षा की रौशनी बढ़ने लगी ।लोग जागरूक हुए और कारवां बढ़ा तो एक हाजी साहब के कारखाने में जगह मिल गई शिक्षा का दिया अब खुली सड़क पर नहीं एक छत के नीचे पनाह पा गया और फिर द स्ट्रीट क्लास खाली समय का सदुपयोग ही नहीं बल्कि जीवन का संकल्प बन गई।

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Anup Mishra

 

पुलिस की नौकरी में तबादले होते रहे और हर बार हर जगह नई चुनौतियों के साथ स्ट्रीट क्लास चलती रहीं । लखनऊ में पोस्टिंग हुई तो लगभग 5400 की आबादी वाले गांव देवीखेड़ा में एक पेड़ के नीचे स्ट्रीट क्लास का ज्ञान का दीपक जलना शुरू हुआ।

शुरुआत में पुलिसिया पहचान छुपाकर अनूप ने पढ़ाना शुरू किया ताकि वर्दी के भय से कोई दूर न भागे क्योंकि अधिकांश बच्चे मजदूरों के थे और गरीब आदमी को पुलिस का बड़ा भय रहता है। इस तरह स्ट्रीट क्लास में बच्चे शिक्षा से तो जुड़े ही जीवन के नैतिक मूल्यों से भी परिचित हुए।

अनूप मिश्रा ने बच्चों को उनके अधिकारों से परिचित कराया गया और नशे की लत में पड़ते मजदूरों ,गरीबों के बच्चों को  सही मार्गदर्शन दिया जाने लगा। बच्चों के भीतर सीखने की प्रवृत्ति तेज़ होती है इसलिए माहौल में काफी सुधार भी होने लगा ।

बदलती तस्वीरे मेहनत के रंग की गवाह बनने लगीं और ये सफ़र लगातार बढ़ता गया जो आज भी निरंतर जारी है , इनके सामाजिक सरोकार के सफर में इनका 14 वर्षीय पुत्र आनन्द कृष्ण मिश्रा अपनी बाल चौपाल के माध्यम से बाखूबी साथ निभा रहा है।

पिता से प्रभावित होकर बेटा भी बन गया नन्हा मास्टर

Aanand (Master Ji)
गरीब बच्चों को बिना सुविधा के पढ़ाते हुए आनंद ( मास्टर जी)

महज 8 वर्ष की उम्र में आनन्द ने भी अपने पिता अनूप की तरह अपनी बाल चौपाल मुहिम के तहत अभावग्रस्त बच्चों को निःशुल्क पढ़ाना और उनकी मदद करना शुरू कर दिया । आज स्ट्रीट क्लास और बाल चौपाल न केवल शिक्षा ,बल्कि कला, संगीत और आत्मरक्षा के गुर भी बच्चों को सीखा रही हैं।

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अनूप मिश्रा के प्रयासों से तमाम सरकारी स्कूलों में बैठने के लिए कुर्सी मेज ,बेंच की व्यवस्था ,खेल के समान की व्यवस्था के साथ पढ़ाई के लिए ज़रूरी समान की व्यवस्था भी की गई ताकि बच्चों का बहुमुखी विकास सरकारी स्कूलों में हो सके। खेलों के प्रति बच्चों की रुचि बचपन से ही होती है और आज खेल के क्षेत्र में तमाम सम्भावनाओं को ध्यान में रखकर विभिन्न खेलों में भी बच्चों को आगे आने के लिए प्रेरित करने का कार्य अनूप कर रहे हैं ।

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शिक्षा के साथ खेल को भी दिया महत्व 

Anup Mishra

विशेषकर छात्राओं को खेल के क्षेत्र में आगे आने के लिए प्रेरित करने के साथ उनको राष्ट्रीय स्तर के कोच से प्रशिक्षण दिलाने में सहयोग और विभिन्न स्कूलों की आपसी प्रतियोगियों के द्वारा  क्रिकेट ,कबड्डी, मार्शल आर्ट जैसे खेलों को बढ़ावा देने का कार्य कर रहे हैं ।

विभिन्न प्राइमरी स्कूलों में बच्चों के बीच प्रतियोगिताएं करवाकर उन्हें पुरस्कृत करना उनका उत्साहवर्धन करना अनूप को ऊर्जा देता है और वो तन मन धन से ऐसे कार्य लगातार करते रहते हैं। बाल चौपाल और द स्ट्रीट क्लास की फीस आगे बढ़ने की लगन है ।

ऐसी स्ट्रीट क्लास हर क्षेत्र में हो तो हमारे अभावग्रस्त बच्चों को  सुनहरे भविष्य के रूप में तराशने के अलावा महंगे कोचिंग संस्थानों की दहलीज पर भीख मांगने की ज़रूरत नहीं होगी । न ही राह चलती गाड़ियों पर जमी धूल साफ करने की ज़रूरत होगी  । क्योंकि बचपन तो सीखने ,गिरने,उठने और फिर दौड़ने का नाम है ताकि ज़िन्दगी की दौड़ में कभी कोई धूल और कंकड़ अपंगता का कारण न बने ।

सलाम है अनूप जैसे देश के सिपाहियों को उनके हौसलों को उनके जज़्बे को,जो अपनी पुलिस की नौकरी के बाद अपने परिवार के लिए बचे हुए पलों में से कुछ पल चुराकर हज़ारों लोगों के मुस्कुराकर जीने की वजह बनते हैं।  ऐसे लोग न सिर्फ राष्ट्र के बल्कि मानवीय मूल्यों के भी सजग प्रहरी होने की सही मायने में भूमिका अदा करते हैं।

ऐसे पुलिसकर्मियों को सरकार द्वारा पुरस्कृत किया जाना चाहिए ताकि अन्य पुलिसकर्मियों में भी सामाजिक व्यावहारिकता के गुणों को विकसित करने की प्रेरणा मिले और ख़ाकी की पहचान उसके मटमैले रंग से नहीं बल्कि उसके उज्ज्वल कार्यों से हो और मित्र पुलिस सही मायने में मित्र साबित हो।

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Written by National TV

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