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पुरानी किताबों और अखबार के पन्ने क्यों हो जाते हैं पीले ? जाने वजह

20 फरवरी , 2018 जर्नलिस्ट अमित कुमा

नेशनल टीवी इंडिया : हम सभी के घर में पुरानी किताबें और कॉपियां रखी होती हैं. जिनका रंग समय के साथ पीला पड़ जाता है. हम सभी के घरों में ऐसी किताबें होती हैं लेकिन क्या आपने कभी इसके बारे में सोचा है कि आखिर ये रंग पीला होता कैसे हैं? आज हम आपको इन्हीं चीजों के बारे में बताने जा रहे हैं कि पुरानी किताबों का रंग आखिर पीला कैसे पड़ जाता है.

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कागज के रंग बदलने वाले सवाल से पहले आपको जानना होगा कागज के बारे में. तो आइए जानते हैं कागज का इतिहास. लगभग 100 ईसा पूर्व कागज की खोज चीन में हुई. उस समय बनाया जाने वाला कागज़ पेड़ की छाल और लुगदी को पीट कर बनाया जाता था, जिसमें आमतौर पर बांस और शहतूत के पेड़ों का इस्तेमाल होता था. धीरे-धीरे चीन से निकल कर ये कागज़ एशिया तक फैलने लगा, जहां इसकी लोकप्रियता दिनों-दिन बढ़ने लगी.

यूरोप में कागज थोड़ा देर से 11वीं सदी के आस-पास पहुंचा. इतिहासकारों का मानना है कि यूरोप में छपे कागज़ का सबसे पुराना डॉक्यूमेंट ‘Christian West’ था, जो शायद Missal of Silos का हिस्सा था. स्पेन में छपे इस डॉक्यूमेंट को ज़्यादातर लोगों द्वारा पढ़ा गया था. कागज़ के विकास में क्रांति का दौर उस समय आया, जब 15वीं सदी में Gutenberg ने प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार कर अख़बार को बड़े पैमाने पर छापा.


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Gutenberg ने अपने अखबार के लिए जिस कागज़ का इस्तेमाल किया, वो भी पौधों के रेशों द्वारा ही बनाये गए थे. 18वीं सदी तक लगभग ऐसे ही कागज़ बनता रहा, पर 19वीं सदी में पौधों के रेशों की जगह लकड़ी के रेशों ने ले ली.

ये बदलाव आया कैसे?

1844 में एक कैनेडियन इन्वेंटर Charles Fenerty ने Atlantic Ocean के पास लकड़ी से कागज़ बनाने की तकनीक का आविष्कार किया. इसके बाद उन्होंने इस इस कागज़ को उस समय के सबसे बड़े अखबार ‘The Acadian Recorder’ के पास भेजा. कम लागत से बनने वाला ये कागज़ अखबार निर्माताओं को काफ़ी आकर्षक लगा, जिसके बाद उन्होंने इसका इस्तेमाल करना शुरू कर दिया.

जब Charles Fenerty इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे. उसी दौरान एक जर्मन जुलाहा Friedrich Gottlob Keller भी सस्ते कागज़ की खोज में काम कर रहा था. 1845 में उसने इसकी खोज के बाद इसका पेटेंट लेने के लिए अर्ज़ी डाली, जिसके बारे में Fenerty ने सोचा भी नहीं था. इसी वजह से इतिहासकार भी Fenerty के बजाय Keller को आधुनिक कागज़ का निर्माता मानते हैं.

लकड़ी से बनने वाले कागज के मुख्यतः दो पॉलीमर घटक थे, पहला Cellulose और दूसरा Lignin. Cellulose एक ऑर्गेनिक घटक है, जो लकड़ी प्रकृति से लेती है. ये एक रंगहीन पदार्थ है, क्योंकि ये जितनी रौशनी को सोखता है उतनी ही परावर्तित कर देता है, जिसकी वजह से इंसानी आंखों को ये सफ़ेद रंग का दिखाई पड़ता है.

वहीं Lignin का काम कागज़ को मज़बूती प्रदान करना होता है. NC State University के प्रोफ़ेसर Dr. Hou-Min Chang का कहना है कि ‘Lignin के बिना कोई भी पेड़ 6 फ़ीट से ज़्यादा नहीं बढ़ सकता. ये एक तरह की गोंद की तरह होता है, जिसका काम Cellulose Fibers को जोड़ कर पेड़ को मज़बूती देना होता है. इसी की मदद से पेड़ तेज हवा के थपेड़े खाने के बावजूद खड़ा रहता है.’

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Lignin अतिसंवेदनशील पदार्थ होता है, जो ऑक्सीजन के साथ जल्दी ही रासायनिक प्रक्रिया कर लेता है. इसी रासायनिक प्रक्रिया की वजह से कागज रौशनी को अवशोषित करता है और भूरे और पीले रंग में बदल जाता है.

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Written by National TV

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