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जानिए! इस शिव मंदिर में पूजा करने वालो का होता हैं बुरा, नहीं चढ़ता शिवलिंग पर जल

प्राचीन रत्नेश्वर महादेव का  मंदिर लगभग 500 साल से एक तरफ झुका हुआ है यह श्रापित मंदिर.

वारांणसी  देवो  के देव महा देव  की नगरी ज़िसे काशी  के नाम से भी जाना जाता है हर हर महादेव बम  बम  भोले के जय कारों से गूँ जने  वाला शाहर जो की धर्मिक स्थल है  करोंड़ों  लोगो की  आस्था  का केन्द्र   है विदेशी   पर्यटको को भी आकर्शित करता  है ये शहर हर मन्दिर  शिव  मन्दिर  दिन रात होती है यंहा  पूजा  अर्चना  लेकिन  इसी वाराणसी के मणिकर्णिका घाट के समीप दत्तात्रेय घाट पर रत्नेश्वर महादेव का मंदिर एक ऐसा  मन्दिर  है  जन्हा ना तो आपको भक्त दिखेंगे और ना ही घंट घड़ियाल की गूँज सुनाई देगी।

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 काशी के इस ऐतिहासिक मंदिर के श्रापित होने के कारण ना ही कोई भक्त यहाँ पूजा करता और ना ही मंदिर में विराजमान भगवान् शिव को जल चढ़ाता है। आसपास के लोगों का कहना है की यदि मंदिर में पूजा की तो घर में अनिष्ट होना शुरू हो जाएगा। आईये हम  आपको आज़ इस  है काशी के गंगा तट पर स्थित ऐतिहासिक शिव मंदिर रत्नेश्वर महादेव मंदिर की  कहानी बताते है.

 लगभग 500 सालों से भी अधिक पुराना है इस का इतिहास


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 प्राचीन रत्नेश्वर महादेव का मंदिर लगभग 500 साल से एक तरफ झुका हुआ है। इस मंदिर के बारे में एक ओर दिलचस्प बात है कि यह मंदिर छह महीने तक पानी में डूबा रहता है। बाढ़ के दिनों में 40 फीट से ऊंचे इस मंदिर के शिखर तक पानी पहुंच जाता है। जो कहीं नहीं दिखता वह काशी में साक्षात नजर आता है। औघड़दानी भगवान और उनकी नगरी काशी दोनों ही निराली है। मंदिर टेढ़ा होने के बावजूद ये आज भी कैसे खड़ा है, इसका रहस्य कोई नहीं जानता है।  

तिल-तिल कर झुकता जा रहा है ये मंदिर

स्थानीय वासी पं. कृपाशंकर द्विवेदी ने के मुताबिक रत्नेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना राजमाता महारानी अहिल्याबाई होल्कर की दासी रत्नाबाई ने करवायी थी. आधार कमजोर होने के कारण कालांतर में यह मंदिर एक ओर झुक गया, जो अपने आप में अनोखा है. खास बात यह है कि मंदिर के झुकने का क्रम अब भी कायम है. मंदिर का छज्जा जमीन से आठ फुट ऊंचाई पर था, लेकिन वर्तमान में यह ऊंचाई सात फुट हो गयी है. 

मंदिर के गर्भगृह में कभी भी स्थिर होकर खड़ा नहीं रहा जा सकता है. गर्भगृह में एक या दो नहीं बल्कि, कई शिवलिंग स्थापित हैं. इसे शिव की लघु कचहरी कहा जा सकता है. द्विवेदी ने बताया  की  मंदिर का इतिहास भी बेहद दिलचस्प  है। इस मंदिर के निर्माण और  श्रापित होने के बारे में  कई किंवदन्तियां  प्रचलित  है

  क्यो कहा जाता हैं श्रापित, यह शिव  मन्दिर

1. प्राप्त जानकारी के अनुसार, जिस समय रानी अहिल्या बाई होलकर शहर में मंदिर और कुण्डों आदि का निर्माण करा रही थीं उसी समय रानी की दासी रत्ना बाई ने भी मणिकर्णिका कुण्ड के समीप एक शिव मंदिर का निर्माण कराने की इच्छा जताई, जिसके लिए उसने अहिल्या बाई से रुपये भी उधार लिए और इसे निर्मित कराया। अहिल्या बाई इसे देख अत्यंत प्रसन्न हुईं, लेकिन उन्होंने दासी रत्ना बाई से कहा कि वह अपना नाम इस मंदिर में न दें, लेकिन दासी ने बाद में अपने नाम पर ही इस मंदिर का नाम रत्नेश्वर महादेव रख दिया। इस पर अहिल्या बाई नाराज हो गईं और श्राप दिया कि इस मंदिर में बहुत कम ही दर्शन पूजन की जा सकेगी।

2. ये भी बताया  जाता है की 15वीं और 16वीं शताब्दी के मध्य कई राजा,रानियां काशी रहने के लिए आए थे। काशी प्रवास के दौरान उन्होंने कई हवेलियां ,कोठियां और मंदिर बनारस में बनवाएं। उनकी मां भी यहीं रहा करती थीं। उस समय उनका सेवक भी अपनी मां को काशी को लेकर आया था।  सिंधिया घाट पर राजा के सेवक ने राजस्थान समेत देश के कई शिल्पकारों को बुलाकर मां के नाम से महादेव का मंदिर बनवाना शुरू किया।  

मंदिर बनने के बाद वो मां को लेकर वहां गया और बोला कि तेरे दूध का कर्ज उतार दिया है। मां ने मंदिर के अंदर विराजमान महादेव को बाहर से प्रणाम किया और जाने लगी। बेटे ने कहा कि मंदिर के अंदर चलकर दर्शन कर लो। तब मां ने जवाब दिया कि बेटा पीछे मुडक़र मंदिर को देखो, वो जमीन में एक तरफ धंस गया है। कहा जाता है तब से लेकर आज तक ये मंदिर ऐसे ही एक तरफ झुका हुआ है। बताया जाता है कि सेवक की मां का नाम रत्ना था, इसलिए मंदिर का नाम रत्नेश्वर महादेव पड़ गया

इंग्लिश स्पेशलिस्ट कर चुके हैं इस  पर  रिसर्च 

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इतिहासकार एसके सिंह के मुताबिक 18वीं शताब्दी के आसपास जेम्स प्रिंसेप ने अपने द्वारा बनाए बनारस के स्केच में रत्नेश्वर महादेव मंदिर को उकेरा था। बताया जाता है कि अंग्रेजों ने भी मंदिर के टेढ़ा होने के पीछे काफी रिसर्च की थी।कई दिनों तक अंग्रेज विशेषज्ञों की टीम ने दौरा भी किया था लेकिन  असल  सच्चाई  आज तक कोई नही  जान पाया ये शिव  लीला  है  देव  की नगरी  देव ही जाने  इसकी  माया पर आपने नही देखा है यह मन्दिर तो एक बार बनारस अवश्य जाएं .

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Written by National TV

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